जगदीशिव्याधिकारणम् स्वामी रोमप्रपन्नाचार्य द्वारा रचित एक प्रमुख संस्कृत ग्रंथ है, जिसे डॉ. महेश झा ने संपादित और विस्तारित किया है। यह ग्रंथ अद्वैत वेदान्त दर्शन के जटिल तत्त्वों और सिद्धांतों की गहन व्याख्या करता है। इसमें जीवात्मा और परमात्मा के संबंध, माया, मोक्ष, और ब्रह्म की अवधारणाओं पर विस्तृत चर्चा की गई है।
मुख्य विषय:
परमात्मा और जीवात्मा का संबंध: इस ग्रंथ में आत्मा और परमात्मा के अद्वैत संबंध की विस्तार से व्याख्या की गई है।
माया और ब्रह्म: माया की भूमिका और ब्रह्म की सत्यता को दर्शाते हुए, जीवन के वास्तविक अर्थ को समझाने का प्रयास किया गया है।
मोक्ष: मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग और उसके महत्व को विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है।
विशेषताएँ:
गहन विश्लेषण: यह ग्रंथ वेदान्त दर्शन के जिज्ञासु और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है क्योंकि इसमें दार्शनिक समस्याओं का गहन विश्लेषण किया गया है।
प्रमाणिक टीका: स्वामी रोमप्रपन्नाचार्य की टीका प्राचीन और आधुनिक व्याख्याओं को समाहित करती है, जिससे यह ग्रंथ अधिक व्यापक और समझने योग्य बन जाता है।
संपादन: डॉ. महेश झा ने इस ग्रंथ को संपादित और पुनर्प्रकाशित किया है, जिससे इसे आधुनिक संदर्भ में भी प्रासंगिक बनाया गया है।







